राहु-केतु को पितृ दोष से क्यों जोड़ा जाता है
राहु और केतु को वास्तविक ग्रह नहीं, बल्कि चंद्र कक्षा के दो बिंदु माना जाता है — फिर भी ज्योतिष में इनका प्रभाव अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। जब सूर्य (पितृ कारक ग्रह) पर राहु या केतु की दृष्टि पड़ती है, या दोनों एक साथ किसी भाव में स्थित होते हैं, तो इसे पितृ दोष का प्रबल संकेत माना जाता है।
कुंडली के किन भावों में प्रभाव सबसे अधिक माना जाता है
- नवम भाव (भाग्य स्थान) में राहु-केतु — पैतृक भाग्य में बाधा का संकेत
- सूर्य पर राहु-केतु की युति या दृष्टि — पिता या पितृ पक्ष से जुड़ी समस्याओं का संकेत
- पंचम भाव में पीड़ित ग्रह — संतान संबंधी चिंताओं से जोड़ा जाता है
- राहु-केतु का सप्तम भाव से संबंध — विवाह में देरी का पारंपरिक कारण
इसके सामान्य असर के रूप में क्या देखा जाता है
परंपरा के अनुसार परिवार इन्हें राहु-केतु जनित पितृ दोष से जोड़ते हैं — मानसिक अशांति, अनिश्चितता का भाव, अचानक आने वाली बाधाएं, और पारिवारिक निर्णयों में लगातार उलझन। ज्योतिषी हमेशा सुझाव देते हैं कि केवल राहु-केतु की स्थिति देखकर निष्कर्ष न निकालें — पूरी कुंडली का विश्लेषण आवश्यक है।
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Call Pt. Pritamपारंपरिक निवारण
गया जी में इस दोष के निवारण हेतु पिंड दान, तर्पण और आवश्यकता अनुसार विशेष पूजन कराया जाता है। जिन परिवारों में यह दोष अधिक प्रबल माना जाता है, उनके लिए त्रिपिंडी श्राद्ध की भी सलाह दी जाती है।
अंतिम बात
राहु-केतु आधारित पितृ दोष निवारण श्रद्धा और परंपरा से जुड़ी प्रक्रिया है। पं. प्रीतम जी कुंडली देखने के बाद ही परिवार को सही दिशा सुझाते हैं।